देश की दो महान विभूतियां

आज विश्व जहां यीशू का जन्म दिवस मना रहा है वहीं भारत देश के ऐसे दो विभूतियों की जन्मतिथि पर विभिन्न प्रकार के आयोजन कर रहा है, जिन्होंने न केवल इस देश के इतिहास को प्रभावित किया है अपितु समाज के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को जन जीवन का अंग बनाने के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया है। ये दो विभूतियां पं0 मदन मोहन मालवीय और पं0 अटलबिहारी बाजपेयी ऐसे युग पुरूष है, जिन्होने लोक जीवन की पवित्रता और प्रामाणिकता के लिये हर उस साधन का इस्तेमाल करते रहे है जो इस देश को समय समय पर शक्ति और उर्जा प्रदान करता रहा है। पं0 मदन मोहन मालवीय एक श्रेष्ठ ब्राहमण परिवार में अवश्य पैदा हुये लेकिन उनकी लोक दृष्टी बड़ी व्यापक और समावेशी रही है। उनका चिन्तन था कि जब तक समाज का हर वर्ग शिक्षित और समरस नहीं होगा तब तक उसे शक्तिशाली नहीं बनाया जा सकता किसी भी राष्ट्र की जीवनी शक्ति समाज कि उस चेतना में है जो उसे अपने अन्दर से प्राप्त होती है। बाह्य साधन, समाज को समृद्ध तो बना सकते है लेकिन उसे शक्तिशाली नहीं बना सकते। हम साधनों के संचय पर ज्यादा ध्यान देते है लेकिन परम्परा और विरासत से प्राप्त उन साधनों को नजरदांज कर देते है जो हमें युगो ंयुगों से प्राप्त है। मालवीय जी भारत के अंतरिक्ष शक्ति के साक्षी थे उन्होंने हिन्दू आस्था के बल को पहचाना था इसीलिये उनको गंगा गाय और गणेश मंे केवल धार्मिक भावना ही नहीं दिखती थी अपितु उनमें निहित उर्जा का उन्हें पता था इसीलिये वह गंगा और गाय की चिन्ता जीवन भर करते रहे। गणेश को उन्होंने उस प्रथम पूज्य देवता के रूप में देखा था जो जन गण में शिक्षा की प्राथमिकता को स्वीकार करता है। गण में गणेश की संभावना उसकी शैक्षिक प्रतिभा पर ही निर्भर करता है इसीलिये जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और अंग्रेजों को देश से बाहर करने का अभियान चल रहा था तब मालवीय जी देश के समाज में व्याप्त अशिक्षा आडंबर और कुप्रथाओं के खिलाफ जनमत तैयार कर रहे थे। दलितों में आत्मविश्वास और सवर्णों में जन सेवा की भावना धनिकों में सामाजिक और राष्ट्रीय हितों में धन लगाने की प्रेरणा देना उनका स्वभाव था। मालवीय जी को गंगा की चिन्ता थी पाश्चात्य शैली में प्रकृति के संतुलन की कीमत पर वह उद्योग के पक्ष में नहीं थे, ऐसे उद्योग जो प्रदूषण पैदा करते है प्राकृतिक संतुलन विगाड़ते है और गंगा जैसी नदियों की निर्मलता को प्रभावित करते है मालवीय जी को कतई पसंद नहीं थे। इसीलिये उन्होंने जब बी0एच0यू0 की स्थापना की तो उसमें सभी वर्गो के प्रवेश के लिये उचित व्यवस्था की हिन्दूत्व के जागरण हेतु जहां उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में विश्वनाथ मंदिर की स्थापना की वहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिये कार्यालय का भी निर्माण किया गंगा बनाने वाले प्रदूषण के संकट को वर्षों पहले उन्होंने महशूस कर लिया था, इसलिये गंगा की निर्मलता और अविरलता को निरंतर कायम करने की दृष्टि से अपेक्षित टेकनाॅलजी के लिये इंजीनियरिग कालेज में रिवर टेकनाॅलजी विभाग का प्रावधान किया। गंगा पर कोई बांध न बने इसके लिये उन्होंने अंग्रेजो से खुले आम लड़ाई लड़ी हरिद्वार की हर की पैड़ी पर गंगा पर बनने बाले बांधों के विरोध में वह धरने पर बैठ गये जब, उस समय तमाम रियासतों के राजाओं ने उन्हें अनशन तोड़ने के लिये कहा तो मालवीय जी ने गंगा को भविष्य में न बांधे जाने के आश्वासन की शर्त रखी और तत्काल अंग्रेज सरकार उनके सामने झुकी और तत्कालीन वायसराय ने गंगा पर बांध न बनाने का लिखित आश्वासन दिया । आज उस महामना का सपना टूट रहा है, गंगा की अविरलता बाधित हो रही है और निर्मलता प्रदूषित ऐसे में अगर हम मालवीय जी को श्रद्धांजलि भी देना चाहें तो कहां से लाये श्रद्धा के वह सुमन जो गंगा की निर्मलता और अविरलता को कायम रखने के संकल्प के रूप में उन्हें समर्पित किया जा सके।
श्री अटल विहारी बाजपेई को मैने निकट से देखा है वह शाताब्दी के ऐसे महापुरूष है जिनकी तुलना के लिये वर्तमान में कोई आदर्श ढूँढ़ पाना कठिन है। वह एक कवि, पत्रकार, वक्ता राजनीतिक तथा शासक से आगे बहुत कुछ है समन्वय और सामंजस्य उनका स्वभाव है। कभी कभी उनमें मुझे एक शंकर दिखाई पड़ता है जो विषमता के हर विष को पीकर समय की कटुता को दूर करता है, कभी वह ब्रह्मा की तरह एक शिल्पी होते है जिनकी रचना में हर प्रतिकूलता एक अनूकूल दिशा प्राप्त कर लेती है। केन्द्र में आज मोदी की सरकार है लेकिन उनके सांसद और दल के नेता उनके प्रति निष्ठावान प्रतीत नहंी होते जबकि श्री अटल विहारी बाजपेई की सरकार में 24 दल थे और वह सब अलग अलग ऐजेण्डे को लेकर एन0डी0ए0 में शामिल हुये थे सबकी अपनी अलग अलग नीतियां थी और सबके अलग अलग नेता। एक बार गठबंधन में जब जयललीता ने अलग स्वर अलग मिजाज दिखाने की कोशिस की तो बाजपेई जी ने उनकी इस धोंस को स्वीकार नहीं किया और सरकार गिरा दी दुबारा फिर सरकार बनी और उसमें वह अनेक दल फिर शामिल हुये जो पिछली सरकार में थे। जिस राम जन्मभूमि के मसले से रामजन्म भूमि और अरूण जेटली के मसले पर आज सरकार कोई समाधान नहीं दे पा रही है उस सरकार में ऐसे मसले बार बार उठते रहे लेकिन प्रधानमंत्री पर उंगली उठाने का साहस किसी का नहीं हुआ, एक दो अवसरों को छोड़ कर पूरे छः वर्ष तक संसद की कार्यवाही न केवल निर्वाध चली अपितु बड़े बडे़ महत्व के विधेयक भी पारित हुये अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में जो कामयाबी वाजपेयी जी को मिली उसका सबसे बड़ा जीवन्त उदाहरण उनके कार्यकाल में मंहगाई पर नियंत्रण था लोग महंगाई भूल गये थे और विकास की बाते करने लगे थे। देश जोड़ो का एक बड़ा अभियान चल पड़ा था रेल, वायुयान और भूतल परिवहन को गति मिली थी। प्रधानमंत्री गा्रमीण सड़क योजना उत्तर से दक्षिण पूर्व से पश्चिम को जोडने वाले स्वर्णिम चतुर्भुज कारिडोर और तमाम राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण शुरू हुआ । नदियों को जोड़ने के लिये वैज्ञानिकों का एक अलग दल गठित हुआ नये नये एयर पोर्ट बनाये जाने लगे। देश के आंतरिक विकास की स्थिति निरंतर सुधार होने लगा विदेशी मोर्चे पर भी आंतकवाद और पाकिस्तान जैसे देशों के विरूद्ध विश्व जनमत तैयार करने में जो सफलता वाजपेयी जी को मिली वह अदभुत थी। तमाम मुस्लिम देश भी आतंकवाद के खिलाफ वाजपेयी जी के समर्थन में आगे आये । अमेरिका की धरती पर अटल जी का जो अभिनंदन हुआ वह स्वयं मैने अपनी आंखों से देखा था जब व्हाईट हाउस की सीढि़यों पर वहां के राष्ट्रपति मि0 क्लिंटन वाजपेयी जी को सहारा देकर ले जा रहे थे, तो ऐसा लग रहा था जैसे काई युवा पुत्र अपने वृद्ध पिता को सीढि़यां चढ़ने में सहारा दे रहा था रोमांचित करने वाला वह दृश्य कभी मेरी आंखों से ओझल नहीं होता। अटल जी कभी आक्रमक नहीं थे लेकिन असत्य और अन्याय के सामने कभी उन्होंने घुटने नहीं टेके। दल हो या उसके बाहर जब भी कोई अपनी चाल से भूचाल पैदा करने की कोशिस करता था अटल जी उसके सामने पहाड़ बनकर खडे़ हो जाते थे। उनका समग्र जीवन दर्शन उनकी इन पक्तियों मे ंनिहित है। -‘‘मै हांर नहीं मानूँगा मै रार नहं ठानँूगा’’ राम जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के वह सदैव पक्षधर रहे लेकिन बात चीत से कोई समाधान निकले इसकी वकालत हमेशा करते रहे। मुझे तो लगता है कि अटल जी के राजधर्म में बड़ा बल था। काश मोदी की यह सरकार उस राज धर्म को समझ पाती और प्राप्त बहुमत का उपयोग उस राजधर्म की स्थापना में करते। लिखने को तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन अनन्त के इन दोनो यात्रियों की जीवन गाथा भी अनन्त है आज उनके अवतरण दिवस पर हम केवल उन्हें प्रणाम कर सकते है ।