महा कुम्भ

भारत अपनी विविधताओं के लिये विश्व में प्रसिद्ध है यहां के लोक जीवन में जो अनेकता दिखाई पड़ती है वह किसी अन्य देश अथवा संस्कृति में नहीं है। रीति-रिवाज, बोली-भाषा, खान-पान, रहन-सहन में भारी अंतर होने के बावजूद सदियों से यदि यह एक सूत्र में बंधा रहा तो उसके पीछे और कई कारण हो सकते हंै, लेकिन इस विविधता में एकता के लिये जो आध्यात्मिक प्रयास हुये उसमें एक प्रमुख है, देश के चार स्तम्भ पर लगने वाला कुम्भ मेला प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक देश के अलग अलग प्रान्तों में स्थित आस्था के इन केन्द्रों पर प्रत्येक तीसरे वर्ष कहीं न कहीं कुम्भ मेलों का आयोजन हजारों वर्ष से होता आ रहा है। सरकारें बदलती रहीं शासन बदलता रहा देश की संवैधानिक राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं के बदलने के बावजूद इन कुम्भों की परम्परा उत्तरोत्तर व्यापक और मजबूत होती गई। यद्यपि हर स्थान पर कुम्भ के आयोजन का क्रम बारह वर्ष बाद आता है फिर भी इनकी ताजगी में कोई अंतर नहीं आता। 14 जनवरी मकर संक्रान्ति जहां प्रयाग कुम्भ के लिये निर्धारित तिथि है, वहीं वैशाखी जो प्रायः 13-14 अप्रैल को होती है हरिद्वार का कुम्भ आयोजित होता है। ऐसे ही सितम्बर और मई के महीनों में नासिक तथा उज्जैन का सिंहस्थ आयोजित होता आ रहा है। इन कुम्भों के आयोजन की न कोई स्वतंत्र संस्था है न समिति अथवा ट्रस्ट मुख्यतः सनातन धर्मावलंबी साधू-संत और उनके अखाडें़ इनके आयोजक होतंे हैं। यद्यपि इन मेंलों का द्वार सभी जाति धर्मों के लोग के लिये सदैव खुला रहा है, हरिद्वार और प्रयाग का कुम्भ जहां गंगा और उसके संगम पर आयोजित होता है वहीं नासिक और उज्जैन का कुम्भ गोदावरी ओर क्षिप्रा के तट पर लगता है। नदियों के प्रति जो आस्था इस देश में रही है वह इन कुम्भों में व्यापक रूप ग्रहण कर लेती है और देश तथा दुनिया का हर आदमी कुम्भ के इस पावन पर्व पर सम्बन्धित नदी में एक गोता लगा कर स्वयं को कृतार्थ करने की लालसा संजोये रहता है। इन कुम्भों में किसी देवता अथवा मंदिर विशेष की पूजा अर्चना मुख्य न होकर नदियों में सामूहिक स्नान ही पर्व के रूप में जाना जाता हैं। इन कुम्भों के विभिन्न पर्वों पर साधू संतों के द्वारा बडे़ पैमाने पर आध्यात्मिक प्रचार-प्रसार के लिये तरह-तरह के अनुष्ठान और आयोजन होते है। निर्धारित तिथियों पर साधू-संतों के सामूहिक स्नान को शाही स्नान कहते है। इस अवसर पर जो अखाड़ों की शोभा यात्रा निकलती है उसमें राष्ट्र की आध्यात्मिक एकता और वैभव का दर्शन होता है। हजारों की संख्या में निर्वस्त्र (नागा) साधूओं का समूह और उनके साथ विभिन्न साज-सज्जा युक्त वाहनों पर चल रहे आचार्यों और मण्डलेश्वरों की छटा जिस नैसर्गिक वातावरण का निर्माण करती है वह भारत की पूण्य भूमि के लिये एक नैसर्गिक धरोहर है। देश में किसी का शासन रहा हो मुगल, अंग्रेज और अन्य उन शासकों ने भी जिनका सनातन धर्म में विश्वास नहीं है इन मेलों के आयोजन में पूरी रूचि ली और सहयोग किया। सम्पूर्ण देश की विषमता इस मेले में जिस समत्व को ग्रहण करती है वह अपने आप में विश्व के सामने भारतीय एकता का अद्भुत उदाहरण है। कभी-कभी इन मेलों का आयोजन एक ही वर्ष के कुछ महीनों में सिमट जाता है। जैसे यदि हम 2015-16 को लें तो सितम्बर में नासिक का कुम्भ, मार्च-अप्रैल में हरिद्वार का अर्ध कुम्भ और अप्रैल-मई में उज्जैन का सिंहस्थ बडे़ शानोशौकत के साथ सम्पन्न होने जा रहा है।
सिंह राशि में जब गुरू (बृहस्पति) का प्रवेश होता है तब उज्जैन का कुम्भ होता है। इस वर्ष यह अवसर 22 अप्रैल 2016 से 21 मई 2016 तक होगा। यह एक अद्भुत संयोग है कि इस वर्ष जिस दिन हरिद्वार का कुम्भ संपन्न हो रहा होगा उसी दिन उज्जैन का सिंहस्थ प्रारम्भ। उज्जैन के कुम्भ में इस वर्ष शाही स्नान की तिथियां निश्चित हो चुकी हंै पहला स्नान अक्षय तृतीया 9 मई को दूसरा 15 मई और तीसरा तथा अन्तिम स्नान 21 मई को होगा।
उज्जैन और उसके आस-पास प्राचीन महत्व के अनेक ऐतिहासिक धर्म स्थान भी है जैसे उज्जैन में ही भगवान महाकालेश्वर भगवती हरिसिद्धी तथा सिद्ध काल भैरव का प्रसिद्ध पीठ है। क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जयिनी का यह पवित्र क्षेत्र इस देश की पुरातन संस्कृति तथा आस्था से जुड़ा हुआ एक ऐसा केन्द्र है जहां से संस्कृत साहित्य, ज्योतिष और तंत्र जैसे शास्त्रों का ज्ञान विश्व को प्राप्त हुआ। भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा कालीदास की साहित्य साधना और राजा भोज की उत्कृष्ठ शासन शैली जिस क्षेत्र से विश्व को प्राप्त हुई हो वह सभी युगो को प्रभावित करने वाला तीर्थ उज्जयिनी है ।
लाखों लोग प्रतिदिन विश्व के कोने-कोने से इस कुम्भ में आगत संतो के दर्शन पवित्र क्षिप्रा में स्नान और भगवान महाकालेश्वर की भस्म आरती का दर्शन करने के लिये अपने अपने घरों से निकल कर चले आ रहे है। भीषण गर्मी में उमड़ता ये जन सैलाब अपने आप में एक आध्यात्मिक अवसर है।
मध्यप्रदेश की प्रदेश सरकार आज अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा और साधन के साथ कुम्भ क्षेत्र में आ रहे संतों, भक्तों और यात्रियों के स्वागत को समर्पित है। हर तरह की सुविधायें जुटाने का प्रयास प्रदेश सरकार ने किया है। साधुओं के शिविरों को निःशुल्क जल, विद्युत, आवास और अन्य सुविधायें जिस उदारता और तत्परता से उपलब्ध कराई है, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया । शिवराज सरकार पग-पग पर प्रतिक्षण आगत यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा में सततलीन है। आज विश्व में क्या हो रहा है हिंसा और आंतक का कोई भय इस भक्ति सागर में दूर-दूर तक नजर नहीं आता। गर्मी में आने वाले यात्रियों को कोई कष्ट न हो इसके लिये हर प्रकार की सुविधा यहां तक की बीमार यात्रियों और साधूओं के लिये अलग अलग उच्चस्तरीय अस्पतालों को निर्माण किया गया है। जहां प्रदेश और उसके बाहर से योग्य चिकित्सक और चिकित्सा संसाधन जुटाये गये हैंै। आवागमन के सभी साधन वहां उपलब्ध है। भारत सरकार ने यात्रियों की सुविधा के लिये विशेष रेल और एयर इण्डिया ने इंदौर एयरपोर्ट (जो उज्जैन से 45 किमी दूर है) को देश के सभी वायु मार्गांे से जोड़ दिया है । वायु सेवा प्रदान करने वाली सभी ऐजेंसियां वहां अपने-अपने काफिले के साथ मौजूद है। पास के नर्मदा तट पर स्थिति ओंकारेश्वार ज्योर्तिलिंग जहां कभी आदि शंकर के आचार्य गोविन्दपाद ने साधना की थी इस मेले से जुड़ा हुआ एक अन्य आकर्षण भी है।
मैं तो यही कहूँगा कि इस देश में ये मेले न होते तो शायद ही यह देश आज जिस रूप में जीवत है, जीवित न होता। कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ था और उसमें से अमृत कलश प्रगट हुआ था तो उसको पाने के लिये देवासुर संग्राम की स्थिति बन गई थी लेकिन भगवान विष्णु ने अपने बुद्धि कौशल से उस संकट को टाला और अमृत कलश इंद्र पुत्र जयंत को सौंप दिया था जयंत उस अमृत कुम्भ को लेकर पहले नासिक फिर उज्जैन और प्रयाग होते हुये हरिद्वार पहुँचा था उन स्थानों पर कुछ क्षण विश्राम के लिये रूका था जहां उस अमृत कुम्भ से कुछ बूंदें छलक कर धरती पर गिरीं थीं जिसके कारण यह स्थान अमृत क्षेत्र कहलाये और उनके प्रति कालजयी आस्था आज भी जनमन में मौंजूद है।
ऐसा लगता है कि एक समुद्र मंथन प्रति 12वें वर्ष इन स्थानों पर अब भी होता है क्योंकि वहां एकत्र जन समुद्र में न तो उत्तेजना होती हे न आक्रामकता सभी बड़े विनम्र और श्रद्धा भाव से इन कुम्भों में आये हुये साधू-संतों के प्रवचन, परस्पर विचार विमर्श और शास्त्रार्थ जैसे धर्म वेत्ताओं से समय का अमृत विचार और ज्ञान के रूप में हमें प्राप्त होता है। ये ज्ञान ही अमृत है क्योंकि यह स्वयं सत्य सनातन और कालजयी है। जब तक यह देश जनमानस में पवित्र आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति जिज्ञासा को जीवित रखेगा तब तक यह कुम्भ चलते रहेंगे और विचार मंथन से प्रकट समय का संदेश इस देश और इसकी संस्कृति को जीवित बनाये रखेगा।